Monday, 5 January 2015

गाली जैसी ही गालियां

मूलत: गालियां दो तरह की होती हैं। पहली जिन्हें हम श्लील कहते हैं, ये गालियां सामने वाले के हावभाव या गुणों को देख कर दी जाती हैं जैसे- कुत्ता, गधा, उल्लू या बन्दर आदि । दूसरे किस्म की गालियां जो अश्लील की श्रेणी में आती हैं वो हमारे तथाकथित सभ्य समाज का वो चेहरा है जो गुस्से की हवा चलते ही उघड़ जाता है । दरअसल ये गालियां पितृ-सत्तात्मक व्यवस्था से उपजे 'मर्द' की दमित यौन-कुंठाएं हैं । सामाजिक जिम्मेदारियों और सभ्य लेखन की मजबूरियों के मद्देनजर यहां सिर्फ पहली किस्म की गालियों का ही जिक्र हो सकता है, सो वही कर लेते हैं।पहली गाली जो आपने निकाली भी है और सुनी भी है वो है बेवकूफ। कमअक्ली या ग़लतियां करने वाले को अक्सर बेवकूफ कहते हैं। वकूफ अरबी भाषा का शब्द है जिसका मतलब है रुकना या डटे रहना। बे-वकूफ वह होता है जो बिना रुके कोई भी काम करता है, जैसे लगातार बोलता है या खाता रहता है उसे बेवकूफ कहते हैं।
एक और गाली है चुगद। कुछ लोग इसे दूसरी श्रेणी में भी रख लेते हैं, पर यह भी विशुद्ध सात्विक किस्म की ही गाली है। सही शब्द है चुग़्द। अक्सर हम गाली देते हुए मूर्ख आदमी को निरा चुग़्द कह देते हैं। इस शब्द का अर्थ उल्लू। उल्लुओं की कई किस्में हैं, उनमें सबसे छोटे उल्लू को चुग़्द कहते हैं। उल्लू से जुड़ी एक और गाली है- उल्लू का पट्ठा। हम पता नहीं क्यों इसे उल्लू का बेटा या बच्चा मान लेते हैं। दरअसल पट्ठे का मतलब है शिष्य या चेला खासतौर पर पहलवान बनने वाला शिष्य। इसके साथ ही एक और गाली है जो बिगड़कर दूसरी श्रेणी में चली गई । फारसी का शब्द है चूली, जिसका अर्थ है कायर, डरपोक, क्लीव या नामर्द। यह चूली व्यक्तिगत स्तर पर चूलिया हो गया और आगे जाकर यह क्या बना गया सब जानते ही हैं।
सीधे तौर पर गधा तो गाली है कि पर एक और गाली है खरदिमाग। आमतौर हम समझते हैं खर यानी गधा और खर दिमाग माने गधे जैसे दिमाग वाला। फारसी में खर का गधे के अलावा एक और अर्थ है बड़ा। खरदिमाग यानी बड़े या ऊँचे दिमाग वाला, घमंडी। खर कई शब्दों के साथ पढ़ा-सुना होगा पर इस समय याद नहीं आएगा। ऐसा एक शब्द है- खरबूज। बूज कहते हैं मीठे को खर और बूज यानी बड़ा (आकार में) मीठा फल। साथ ही एक और शब्द है तरबूज। यानी वह मीठा फल तो तर हो, यानी पानी से भरपूर हो। लगे हाथ यह भी कि कुछ क्षेत्रों में तरबूज को हन्दवाना भी कहा जाता है जो पंजाबी में आकर दुहाणा हो गया और राजस्थानी में मतीरा। खर से एक शब्द है खरगोश। खर मतलब गधा। गोश का अर्थ है कान। फारसी में कहा जाता है कि गोश गुजार कर रहा हूं। यानी आपके कानों के लिए अर्ज है। खरगोश का अर्थ हुआ गधे जैसे कानों वाला।

Sunday, 4 January 2015

शातिर और दबंग

आम धारणा है कि भाषा को अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे लोगों ने बिगाड़ा है। सच्चाई इसके बिलकुल उल्ट है, भाषा की जो जड़ें तथा-कथित पढ़े-लिखे वर्ग ने खोदी हैं वैसी अनपढ़ तो कर ही नहीं सकता। हालांकि लेखकों, कवियों और शायरों से शुद्ध भाषा की उम्मीद नहीं रखी जाती उनके यहां तो नए विचार और कल्पना की उड़ान तो हो सकती है शुद्ध व्याकरण नहीं। लेकिन पत्रकार जो किसी भी लिखने वाले से ज्यादा पढ़ते और लिखते हैं, वे जब भाषा का जनजा निकालते हैं तो आश्चर्य होना स्वभाविक है। आज के मीडिया ने शब्दों के लिए अपने ही अर्थ घड़ लिए हैं, अकसर जिनका वास्तविक अर्थों से दूर-दूर तक कोई वास्ता तक नहीं होता। ऐसा ही दो शब्द है दबंग और शातिर।
शब्दकोश दबंग का अर्थ बताता है- जो किसी ने न दबे, निडर, बेधड़क, प्रभावशाली, दिलेर। अब इन अर्थों में कहां है गुण्डागर्दी या बदमाशी का भाव? आजकल के अखबार और टीवी दबंगों की दबंगाई के किस्से न जाने किन अर्थों में सुना और बता रहे हैं। आज से मात्र दस-बारह साल पहले तक दबंग एक सम्मानजनक और आदर योग्य शब्द था, पर जब से यह शब्द मीडिया के हत्थे चढ़ा है इसके अर्थ ही बदल गए। आज दबंग दो टके का गुण्डा बनकर रह गया है, जिसका काम अपने क्षेत्र में आतंक फैलाना भर रह गया है।
दूसरा शब्द है शातिर। इस शब्द को अक्सर शातिर चोर, शातिर बदमाश, शातिर लुटेरा जैसे अलंकारों के साथ पढ़ा-सुना होगा। पहली नजर में शातिर का अर्थ छटा हुआ या खतरनाक जैसा लगता है। ह$कीकत में शतरंज के खिलाड़ी को शातिर  कहते हैं, जैसे गोल्फ खेलने वाले को गोल्फर और फुटबॉल खेलने वाले को फुटबॉलर। शातिर महज एक माहिर खिलाड़ी होता जो न तो खतरनाक है और न ही छटा हुआ। क्या विश्वानाथ आनंद या गैरी कास्परोव किसी भी तरह से खतरनाक लगते हैं। हद तो तब हो जाती है जब कहा जाता है कि चार शातिर पकड़े, उनसे तमंचा और स्मैक बरामद। कोई भी भाषा को जानकार बेहोश हो सकता है जब किसी समाचार-पत्र में यह पढ़े कि- 'बहुत शातिर होते हैं मच्छर...।' बीबीसी की हिन्दी सर्विस वाले तो इसके लिए सारी हदें ही लांघ गए। वो लिखते हैं- 'कौअे से भी शातिर होते हैं चिपांजी...।'
अरबी भाषा के इस शब्द के साथ डॉ. हरदेव बाहरी द्वारा सम्पादित हिन्दी के सबसे प्रतिष्ठित शब्दकोश ने भी वही किया जो आम आदमी करता आ रहा है। डॉ. बाहरी इसका अर्थ बताते हैं- परम धूर्त, काइयाँ और चालाक। हमारे भाषा-विज्ञानियों ने शतरंज के खिलाड़ी के लिए सही शब्द शातिर छोड़कर पतंगबाज की तर्ज पर एक नया शब्द घड़ लिया है- शतरंजबाज। इसके लिए एक कहावत याद आती है- कुँए में ही भांग पड़ी हुई है। अन्दाजा है कि पहली बार बहुत तेज दिमाग ठग या धोखेबाज अपराधी के लिए शातिर दिमाग अपराधी इस्तेमाल हुआ होगा। धीरे-धीरे दिमाग गायब हो गया रह गया महज शातिर अपराधी। बाद में अपराधी भी गायब हो गया और सिर्फ शातिर रह गया। इस तरह एक अच्छा-भला शतरंज का खिलाड़ी बन गया छटा हुआ अपराधी।

काँइयां और लीचड़

गालियों  का प्रचलन समाज में कब से प्रारम्भ हुआ और सबसे पहले किसने किसको गाली दी थी तथा सुनने वाले पर उसकी प्रतिक्रिया किस रूप में प्रकट हुई थी- यह शोध के लिए एक मजेदार विषय हो सकता है। मान्यता है कि गालियों का प्रादुर्भाव भाषा के विकास के साथ-साथ ही हुआ होगा। तीक्ष्ण, अप्रिय और अपमानित करने वाले शब्दों को 'गाली' माना गया है। शब्द-प्रहार, शस्त्र-प्रहार से कहीं अधिक घातक और मर्मभेदी हो सकता है, और प्राय: होता भी है। स्मरण कीजिए, महाभारत का वह प्रसंग जब द्रोपदी ने दुर्योधन का उपहास 'अंधे का अंधा' कहकर किया था, जिसके परिणाम में महाभारत जैसा भीषण युद्ध हुआ। रामचरित मानस का वह प्रसंग भी जब लक्ष्मण ने परशुराम को नसीहत देते हुए कहा है- वीर व्रती तुम धीर अछोभा। गारी देत न पावहु सोभा।।
गालियों का एक दूसरा पहलू यह भी है कि वे मानव-जाति के परस्पर सम्बन्धों को अनायास उद्घाटित करती हैं। यूँ तो गालियाँ विश्व की लगभग सभी भाषाओं और बोलियों में कही-सुनी जाती हैं, किन्तु भारत में गालियों का अपना अलग ही अन्दाज है। भारत में गायी हुई गालियों का बुरा नहीं माना जाता। कदाचित् इसीलिए हमारे यहाँ विवाह-शादियों में तथा होली जैसे त्यौहारों पर गालियों को गाने की पुरातन प्रथा चली आ रही है। विवाह मेंं महिलाओं के द्वारा और होली पर पुरुषों के द्वारा गायी जाने वाली और उमंगमय गालियों का कोई बुरा नहीं मानता। जबकि अन्य किसी अवसर पर दी हुई किसी की भी गाली हमें गोली की तरह बींध कर रख देती है और क्षणभर में खून-खराबे की नौबत आ जाती है।
गालियों के अनेक प्रकार हैं। कुछ गालियाँ जाति-बोधक होती हैं, तो कुछ संबंध बोधक। कुछ गालियाँ मानव की विकलांगता से जुड़ी होती हैं, तो कुछ उसके स्वभाव से। कई गालियाँ मानव का जानवरों से तादात्म्य स्थापित करती हैं, तो कई गालियों में उसके बौद्धिक स्तर की धज्जियाँ उधेड़ दी जाती हैं। आज के दोनों शब्द इन संदर्भो में गाली की ही श्रेणी में आते हैं।
लीचड़ शब्द सबने सुना ही होगा, हो सकता कुछ का वास्ता लीचड़ों से पड़ा भी हो। शब्दकोश इसकी उत्पत्ति के बारे में कुछ नहीं कहता पर डॉ. हरदेव बाहरी के शब्दकोश में इसका अर्थ है- सुस्त, काहिल और नाकारा। बहुत से लोग लीचड़ कंजूस और चिपकू किस्म के आदमी को भी कहते हैं और कुछ घटिया व्यवहार करने वाले को।
इसके सारे अर्थ स्वीकार कर भी लें तो भी सवाल अपनी जगह है कि यह शब्द किस भाषा का है और आया कहां से? जानकर आश्चर्य होगा कि यह शब्द अंग्रेजी शब्द लीच (Leech)से बना है जिसका अर्थ है जोंक। यह पानी का एक कीड़ा है जो शरीर से चिपक कर खून चूसता है। यही वजह है कि अधिक चिपकने वाले आदमी को भी जोंक कहा जाता है। इसी लीच में हिन्दी का तड़का लगा कर नया शब्द से बना लीचड़।
इसी तरह एक शब्द है काँइयां। शब्दकोश में इसका अर्थ है चालाक, धूर्त या मक्कार। इस शब्द के पीछे एक रोचक कहानी है। बरसों से हरियाणा, राजस्थान और पंजाब में यूपी और बिहार से लोग काम-काज के लिए आते रहे हैं। यूपी और बिहार से आये ये लोग आपस में बात करते हुए एक दूसरे को 'ऐ हो भइया' या 'कैइसन हो रे भइया' कह कर बुलाते-पुकारते थे, इसी वजह से उनका नाम 'भइया' चलन में आ गया।
ऐसे ही राजस्थान के लोग नौकरी और व्यवसाय के लिए बंगाल और असम जाते रहे हैं। ये राजस्थानी बंगाल और असम रहते हुए आपस में बात करते हुए 'काईं है, काईं करै है, काईं चाइजै' आदि बोलते रहते थे। इन राजस्थानियों के चालाकी के किस्से तो सारे देश में मशहूर हैं ही। यही वजह है कि वहां के लोग इन चालाक राजस्थानियों को 'काँई-काँई' बोलने के कारण काँइयां कहने लगे और धीरे-धीरे यह शब्द सारे देश में प्रचलित हो गया।

Sunday, 15 June 2014

न बदमाश - न लुच्चा

अक्सर चंचल और शोख बच्चों को बदमाश कह दिया जाता है। बहुत सारे कारणों से बच्चे बदमाश नहीं हो सकते। बदमाश फारसी भाषा का शब्द है जो दो अलग-अलग शब्दों से मिलकर बना है 'बद' और 'मआश' (या माश)। बद का अर्थ है खराब या बुरा। यह शब्द बहुत से शब्दों के पहले लगता है जैसे जिसकी नीयत खराब हो वह बदनीयत, जिसका चाल-चलन खराब हो वह बदकार और जिसकी किस्मत खराब हो वह बदकिस्मत आदि। माश या मआश का अर्थ है आजीविका या रोजी-रोटी का साधन। अक्सर मिलने पर काम-धन्धे के बारे में पूछ लिया जाता है कि 'आपका जरिया-ए-मआश क्या है?' लिहाजा बदमाश का अर्थ वह आदमी है जो ग़लत या अनैतिक तरीकों से आजीविका चलाता हो। इस लिहाज से छोटे और मासूम बच्चे कभी बदमाश हो ही नहीं सकते। बदमाश उन्हें भी नहीं कहा सकता जो लड़कियां छेड़ते हैं, या स्कूल-कॉलेज में हुड़दंग करते हैं।
इसके साथ ही 'बदमाशी' करने वाले बच्चों को शैतान भी कहते हैं। देखा जाता है कि अक्सर मां-बाप अपने साल-छह महीने के बच्चों की शरारतों से तंग आकर शिकायत करते हैं- 'आजकल यह बहुत शैतान हो गया है...'  इस्लाम के अनुसार शैतान एक फरिश्ता ही था जिसने अल्लाह की आज्ञा का उल्लंघन किया, इस वजह से उसका बहिष्कार किया गया, तब से वह लोगों को पाप करने की ओर प्रवृत्त करता है। यानी सभी बुरे काम और पाप करवाना शैतान का काम है, जिसके लिए शब्द है कार-ए-शैतानी जो बाद में बिगड़कर कारस्तानी बन गया। सार यह कि भगवान के समकक्ष ताकत रखने वाली कोई दूसरी शक्ति जो इंसान से भगवान की इच्छा के विरुद्ध पाप करवाती है। इसके बाद भी क्या बच्चे शैतान हैं? क्या उनकी मासूम सी जिद्द और नादानियां शैतानी हैं?
अब इसी रौशनी में कारस्तानी को भी ही देख लें। उर्दू का शब्दकोश तो इसे शामिल ही नहीं करता पर हिन्दी में इसका अर्थ है, साजिश या चालबाजी। जोकि सही नहीं है क्योंकि कार-ए-शैतानी को एकसाथ करने से कारस्तानी बन ही नहीं सकता और अर्थ के लिहाज से भी यह मूल अर्थ से कोसों दूर है।
बदमाश का एक और रिस्तेदार शब्द है- लुच्चा। यथा लुच्चा-बदमाश। अर्थ के लिहाज से इन दोनों शब्दों का कोई मेल नहीं है, क्योंकि लुच्चे का अर्थ शब्दकोश के अनुसार है- बदमाश, शोहदा, कमीना, दुराचारी है पर आम बोलचाल में लुच्चे का अर्थ लिया जाता है- गंदी और अश्लील बातें या इशारे करने वाला। राजस्थानी भाषा में तो अक्सर अश्लील बातें करने वाले के बारे में कहा जाता है- यह बहुत लुच्ची-लुच्ची बातें करता है...। जबकि यह दोनों ही अर्थ ग़लत हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार लुच्चा शब्द संस्कृत के लोचन शब्द से बना है। यानी लोचन से काम लेने वाला, औरतों को देखने या घूरने वाला हो गया लुच्चा। अंग्रेजी में इस हरकत को स्टेअर (Stare) कहते हैं लेकिन लुच्चे के संदर्भ में सही शब्द है ओगॅल (Ogle)। असल में यह तुर्की भाषा के शब्द लुच से बना है जिसका अर्थ है- नंगा, लम्पट और भैंगा। हिन्दूस्तान में आकर लोचन और भैंगा पास-पास हो गए तो नया शब्द बना लुचपना और लुचपना करने वाला लुच्चा।

Saturday, 14 June 2014

धणी खम्मा - घणी खम्मा

राजस्थान में अभिवादन के लिए बहुत ही प्रचलित वाक्य है- खम्मा घणी। इसके जवाब में सामने वाला भी घणी घणी खम्मा कह देता है। इसकी देखा-देखी आजकल टीवी सीरिअल और फिल्मों में अभिवादन के लिए घणी खम्मा का प्रयोग किया जाता है जिसका जवाब सलामुन आलैकुम की तर्ज पर वालेकुम अस्सलाम यानी खम्मा घणी दिया जाता है। यह सीरिअल और फिल्मों में तो अज्ञानता की वजह से चल सकता है पर आश्चर्य तब होता है जब पढ़े लिखे लोग भी घणी खम्मा कह कर अभिवादन करते देखे-सुने जा सकते हैं। इतना ही नहीं रामदेव जी के बहुत सारे भजनों में ये शब्द बार-बार इन्हीं अर्थों में आते हैं। हद तो तब हो जाती है जब लोग अपने वाहनों पर बिना इसका अर्थ जाने यह लिखकर घूमते हैं- ''बाबै नै घणी घणी खम्मा"
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यह कितना गलत इस्तेमाल है। दरअसल देवनागरी में 'ध' और 'घ' दिखने में लगभग एक जैसे हैं इसलिए अकसर लोग धोखा खा जाते हैं। यही वजह है कि राजस्थानी के शब्द धणी (मालिक, पति) को घणी (ज्यादा, बहुत) पढ़ते और बोलते हैं। इस अज्ञानता की वजह से आजकल पढ़े-लिखे लोग भी कमअक्ली कर बैठते हैं।
इसके सही इस्तेमाल है 'धणी खम्मा' या 'खम्मा धणी'। मूलतः यह दो शब्दों से मिलकर बना है। पहला शब्द है धणी जिसका अर्थ है मालिक या पति, और दूसरा शब्द है खम्मा जिसका अर्थ है क्षमा। दरअसल खम्मा क्षमा का ही अपभ्रंस है जो क्षेत्रीय भाषाओं में आकर क्षमा से खमा या खम्मा बन गया, ठीक वैसे ही जैसे क्षेत्र से खेत और क्षत्री से खत्री बने हैं। कुल शब्द का मतलब है मालिक क्षमा करें। इसके लिए अंग्रेजी का एक वाक्य एक्सक्यूज मी बिलकुल सटीक बैठता है। अदब और सभ्यता के लिहाज से कुछ भी कहने से पहले या किसी बातचीत के बीच में बोलने से पहले एक्सक्यूज मी, माफ़ कीजिए या क्षमा करें जैसे वाक्य बोले जाते हैं। राजस्थान में आज भी बड़े रसूख वाले लोगों, मंत्रियों और अधिकारियों को हुकुम, धणी या मायत कहने का चलन है। जैसे मुगलिया दरबारों में कुछ भी कहने से पहले पूछा जाता था कि- 'जान की अमान पाऊँ तो अर्ज करूँ...।' ठीक इसी तरह राजपूताना में भी राजा-महाराजाओं के दरबार में कुछ बोलने से पहले 'धणी खम्मा या खम्मा धणी' से बात आरम्भ करते थे।
इन अर्थों की रौशनी में 'बाबै नै घणी घणी खम्मा' कितना हास्यस्पद  लगता है? किसी को प्रणाम या नमस्कार के लिए भी घणी खम्मा का प्रयोग कितना उचित है? अब पता नहीं कब और कैसे यह वाक्य अभिवादन में बदल गया।
अभिवादन के लिए एक और शब्द है 'मुजरा'। अरबी भाषा के इस शब्द का हिन्दी फिल्मों ने बहुत बेड़ा गर्क किया है। जिसकी वजह से हमने इसका एक ही अर्थ समझा है- कोठों पर तवायफों द्वारा किए जाने वाले नाच-गाने को मुजरा कहते हैं। दरअसल झुककर अभिवादन को ही मुजरा कहा जाता है, राजस्थानी भाषा में यह शब्द आज भी इसी संदर्भ में इस्तेमाल होता है। इस पर राजस्थानी में बहुत से गाने भी प्रचलित हैं। इस शब्द के तवायफों से जुडऩे का कारण आसानी से समझा जा सकता है। एक जमाना था जब बड़े-बड़े नवाब और राजा-महाराजा अपने बच्चों को तमीज, तहजीब और आदाब सिखाने के लिए तवायफों के यहां भेजते थे। तवायफें आदाब और तौर-तरीके सिखाती और नाच-गाने से पहले लगभग दोहरा होने की हद तक झुककर सलाम करती थी। यह सलाम या अभिवाद ही मुजरा है, जिसकी वजह से उनके नाच-गाने को मुजरा समझ लिया गया।
मुजरे का एक अर्थ और भी है- किसी को दिए जाने वाले धन में से कटौती करना। राजस्थान, पंजाब और हरियाणा के वो लोग जो खेती हिस्से या ठेके पर करवाते हैं वे इसे आसानी से समझ लेंगे क्योंकि उनका वास्ता मुजारे से पड़ा है। अपनी खेती को उपज के आधे, चौथाई या पांचवें हिस्से पर ठेके दिया जाना यहां आम बात है। जो आदमी इस तरह जमीन लेता है उसके बदले जो धन देता है उसमें से मुजरा काट कर जमीन मालिक को देता है उसे इसीलिए मुजारा भी कहते हैं। आम लोग नें इसे भी मजदूर को बिगड़ा हुआ रूप मजूर माना और फिर मुजारा मान लिया।

Friday, 13 June 2014

जुगाड़ की भाषा या भाषा का जुगाड़

भाषा के मामले में दुनिया का हर आदमी जुगाड़ी है। वह शब्दों का जुगाड़ मुख-सुख के लिए ढूंढ ही लेता है। जैसे बहुत से पंजाबी अदरक को अदकर कहते हैं, कीचड़ को चिक्कड़ और चाकू को काचू बोलते हैं। इसी तरह उत्तरप्रदेश के बहुत लोग लखनऊ को नखलऊ कहते सुने जा सकते हैं। जब बात जुगाड़ की आ गई है तो बात करते हैं वर्कशॉप और वाहनों से संबंधित उन शब्दों की जिनके जुगाड़ मुख-सुख की वजह से तलाश लिए गए हैं।
इंजन नम्बर और चेसिस नम्बर के बारे में हम सबने सुना रखा है। उच्चारण व लिखने की दृष्टि से इंजन को एÓन्जिन बोला और लिखा जाना चाहिए पर आजकल इंजन या इंजिन हमें स्वीकार हो गया है। दूसरा शब्द है चेसिस। जिसे कुछ लोग चैसी या चेसिज या चेचिस भी कहते हैं। इस शब्द का सही उच्चरण है शैसे या शैस्इ। यह शब्द बोलने और लिखने दोनों के लिहाज से आजकल नजर ही नहीं आता। जब वर्कशॉप खुली हुई है तो कुछ और शब्दों पर भी बात भी कर लेते हैं। एक औजार है-जैक। यह वह औजार है जिससे वाहनों के टायर आदि बदलने के लिए वाहन को उपर उठाया जाता है। हम लोग इसे बहुत ही जल्दी में जेक बोलते हैं। जबकि इसे धीरे से खींचकर जैअ्क बोलना चाहिए। एक ही स्पैंलिग के साथ इस जैक के बहुत सारे अर्थ हैं जैसे- नाविक, मल्लाह, मजदूर, नौकर, गुर्गा, लौंडा, गुलाम, छोटा झंडा और कटहल आदि। ताश में भी जो गुलाम होता उसे भी जैक ही कहते हैं।
एक और बहुत ही प्रचलित शब्द है टोचन। यह स्टील, जूट या पलास्टिक की रस्सी होती है जिसकी मदद से एक खराब वाहन को दूसरे वाहन से बांध कर खींचकर ले जाया जाता है। सही शब्द है टो-चेन या टोइंग चेन। यह दो शब्दों से मिलकर बना है। टो यानी खींचना चेन यानी धातु की रस्सी। अब यह स्त्रीलिंग टो-चेन कब पुल्ंिलग टोचन हो गया पता ही नहीं लगा। हम में से बहुत से लोग टोचन को अंग्रेजी का शब्द नहीं मानकर जुगाड़ की तरह का एक जुगाड़ी शब्द ही समझते हैं। ऐसा समझने के पीछे एक तर्क भी है। हमारे मिस्त्री बहुत से औजारों और पुर्जों का नाम उनकी शक्ल देखकर रखते हैं। ये लोग रिचेट को कुत्ता, टेपेट को चिड़ी, इगनीशिअन कॉयल को घुग्गी, ओपनएंड स्पेनर को चाबी, सॉकेट को गोटी, प्लायर्स को जमूरा और नोज प्लायर्स को चूहा प्लास कहते हैं। हद यह कि साइकिल के गिअर टीथ खराब होने पर हम कहते हैं- इसके कुत्ते फेल हो गए। अब तो यह एक मुहावरा बन चुका है, कमजोर, आलसी और बड़बोले लोगों के लिए इसे अकसर प्रयोग में लाया जाता है।
अंत में बात करते दो और शब्दों की, पहला है बबलिंग। आमतौर पर कोई वाहन अगर उछल-उछल कर चल रहा हो या उसका टायर डगमगा रहा हो तो उसे बबलिंग कहते हैं। इसका सही उच्चारण है बोबलिंग या वैंबलिंग। दूसरा शब्द है-जैनुअन। जिसे हम जैनियन या जीनाइन भी कहते हैं। ऐसा नहीं है कि हम विदेशी भाषाओं के साथ ही ऐसा व्यवहार करते हैं, हम आपनी मातृ भाषा की भी इतनी ही इज्जत करते हैं।

Saturday, 5 April 2014

कहां है जंगलराज?

जंगलराज आजकल एक ऐसा शब्द बन गया है जो दिन में दस बार सामने आता है। आम मान्यता के अनुसार जहां कानून-कायदे नाम की कोई चीज न हो उसे जंगलराज कहते हैं और सभ्य समाज में जो हरकतें स्वीकार नहीं हैं, उन्हें पाश्विकता कहते हैं। अब इससे बड़ा झूठ कोई दूसरा नहीं हो सकता। इसे समझने से पहले जंगल के कानून को समझना जरूरी है। जंगल में सबसे ताकतवर शेर को माना गया है। शेर ने अपनी इस ताकत के बल पर आज तक किसी शेरनी, बकरी, गाय या लोमड़ी से बलात्कार नहीं किया। उसने कभी भी अपनी भूख से ज्यादा शिकार नहीं किया। एक बार पेट भरने के बाद शेर अपने ऊपर खेलते हुए बकरी के बच्चे को छूता तक नहीं है। शेर ने कभी किसी दूसरे जानवर को सिर्फ इसलिए नहीं मारा कि वो किसी और प्रजाति का है। उसने हर बार सिर्फ भूख लगने पर ही किसी जानवर को मारा है। अब दूसरे जानवरों की बात करें तो कमोबेश यही नियम उनका भी है।
अब अगर बात करें शारीरिक सम्बंधों और बलात्कार की तो जंगल में यह शारीरिक संबंध केवल सन्तान उत्पत्ति के बनाए जाता हैं, वह भी तब, जब मादा इसके लिए तैयार हो और आमंत्रित करे। वहां आनन्द और मौजमेले के लिए शारीरिक संबंधों की कोई जगह नहीं है। कुछ जीव तो ऐसे भी हैं जो अपने जीवनकाल में केवल एक ही बार ये संबंध बनाते हैं। अब यह कहां तक जायज है कि हम बलात्कारियों और अति-कामुक लोगों को हवस का भूखा भेडिय़ा कहते हैं?
कोई भी जानवर जंगल को खाली देखकर उस पर कब्जा नहीं करता। जमाखोरी, मिलावट और कालाबाजारी नहीं करता, हत्ता के वो साथी जानवरों को इंसान के नाम पर गंदी और अश्लील गालियां भी नहीं निकालता। जबकि हम बात-बेबात अपने ही बच्चों को जंगली, गधा, उल्लू का पट्ठा, कुत्ता, सुअर और जाने क्या-क्या कहते हैं। जानवरों ने कभी यह दावा भी नहीं किया कि वो ईश्वर की श्रेष्ठ कृति हैं और न ही ऐसा कोई काम किया जिससे सारी जानवर जाति का सिर शर्म से झुक जाए। जानवरों ने हमेशा वही काम किया जिसके लिए प्रकृति ने उनको पैदा किया। जानवरों को कायदे-कानून में रखने के लिए न तो पुलिस है न ही सेना, न अदालत है, न जेल और न ही फांसी की सजा।
इंसान की महानता देखिए कि सारी गंदगी और ग़लाज़त उसके अपने दिमाग में है और बदनाम बेचारे निरीह जानवरों को करता है। इंसान अपनी हर घटिया हरकत को जानवरों जैसा व्यवहार और पाश्विक कहकर अपना पल्ला झाड़ लेता है। जानवरों ने आज तक जितने इंसान मारे हैं वो या तो आत्मरक्षा के लिए या मजबूरी में भूख लगने पर मारे हैं। लेकिन इंसान ने जानवरों और इंसानों को क्यों मारा है यह आप-हम सभी जानते हैं। अब फैसला आप पर है कि आज के बाद जंगलराज को आप किस संदर्भ में प्रयोग करेंगे।