Thursday, 3 April 2014

शब्दों के बारे में दो शब्द

मैं यह लेख किसी भाषा विज्ञानी की हैसियत से नहीं लिख रहा हूं, मैं भी भाषा का एक साधारण सा छात्र हूं जो उत्सुकतावश बंजारे शब्दों के साथ भाषा के इस जंगल में आ गया हूं। इस आवारगी में जो कुछ भी मिल रहा है उसे ही साझा करने का प्रयास कर रहा हूं। इस सफर को आरम्भ करने से पहले कुछ छोटी-छोटी बातें जो इस बंजारगी में शायद सहायक हों।
दुनिया की सभी भाषाएं शब्दों से ही बनी हैं और प्राचीनकाल से ही शब्द इंसानों के साथ-साथ यात्रा करते रहे हैं। यही वजह है कि इंसान आते-जाते रहे हैं मगर उनके कुछ शब्द हमेशा के लिए हमारे बीच रह जाते हैं। ये शब्द स्थानीय भाषाओं में इस तरह घुल-मिल जाते हैं कि इन्हें बोलने वाले भी अपना ही मान लेते हैं। हमारी हिन्दी भी एक ऐसी ही भाषा है जिसमें दुनिया भर की दूसरी भाषाओं के हजारों शब्द मिल जाएंगे जिन्हें हम चाहकर भी अलग नहीं कर सकते। हिंदी भाषा में लगभग 2500 अरबी, 3500 फारसी और 3000 अंग्रेजी के अलावा तुर्की, पुर्तगाली, फ्रांसीसी, युनानी, चीनी, जापानी और रूसी जैसी विदेशी भाषाओं के अलावा क्षेत्रीय भाषाओं के असंख्य शब्द शामिल हैं।
उत्पत्ति के आधार पर शब्दों के चार भेद हैं- तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी। तत्सम वे शब्द हैं जो संस्कृत से हिन्दी में बिना किसी परिवर्तन आए हैं जैसे- अग्नि, क्षेत्र, वायु, रात्रि, सूर्य आदि। तद्भव वे शब्द हैं जो रूप बदलने के बाद संस्कृत से हिन्दी में आए हैं जैसे- आग(अग्नि), खेत(क्षेत्र), रात(रात्रि), सूरज(सूर्य) आदि। तथा देशज उन शब्दों को कहते हैं जो क्षेत्रीय प्रभाव के कारण परिस्थिति व आवश्यकतानुसार बने और प्रचलित हो गए जैसे- पगड़ी, गाड़ी, थैला, पेट आदि। विदेशी या विदेशज वे शब्द हैं जो विदेशी जातियों के संपर्क से हिन्दी में प्रयुक्त होने लगे हैं। जैसे- स्कूल, अनार, आम, कैंची, अचार, पुलिस, टेलीफोन, रिक्शा आदि। कुछ शब्द ऐसे भी हैं जिनके लिए या तो हिन्दी में शब्द हैं ही नहीं या उनकी जगह काम आने वाले हिन्दी शब्द चलन से लगभग बाहर हो चुके हैं। जैसे अंग्रेजी के पैन-पैंसिल, रेडिओ-टीवी, डॉक्टर-नर्स, बस, रेल, टिकट, मशीन, सिगरेट और साइकिल आदि।
अरबी और फारसी के शब्दों को तो पहचाना ही मुश्किल है क्योंकि हम बचपन से अ-अनार पढ़ते आ रहे हैं। हालांकि हम चश्मे को ऐनक पढ़ते रहे हैं पर कहते आज भी चश्मा ही हैं। अब जमींदार, दुकान, दरबार, नमक, बीमार, बरफ, रूमाल, आदमी, चुगलखोर, औलाद, अमीर, ग़रीब, क़त्ल, कानून,  क़त्ल क़ैदी, रिश्वत, औरत, फ़क़ीर आदि हजारों शब्द हैं जिन्हें पहचानना लगभग असंभव है। अब तुर्की के शब्द ही लें- कैंची, चाकू, तोप, बारूद, लाश, दारोगा या फिर पुर्तगाली के- अचार, आलपीन, कारतूस, गमला, चाबी, तिजोरी, तौलिया, बाल्टी, फीता, साबुन, तंबाकू जिनके पर्यायवाची ढूंढने में उम्र निकल जाएगी।
मेरा मक़सद किसी को भी भाषा का विद्वान बनाना नहीं बल्कि उनके सही स्वरूप से परिचित करना और करवाना और उनकी उत्पत्ति के बारे में कुछ बातें करना भर है। जो शब्द हमारे बीच रच-बस गए हैं उन्हें बदलना या निकालना अब संभव नहीं हैं, फिर भी शब्दों का बंजारापन जारी है वे अपने लाव-लश्कर के साथ हमेशा आगे बढ़ते ही रहते हैं।

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